February 26, 2024

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वो हीरो जिन्होंने दिलाई थी 1971 के युद्ध में भारत को जीत और पाकिस्तान को टिकाए घुटने

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kargil Vijay Diwas

kargil Vijay Diwas

Vijay Diwas: 16 दिसंबर 1971 यह महज एक तारीख नहीं है। यह दिन दुनिया के नक्शे को बदलने वाला दिन था। 16 दिसंबर 3 दिन तक चले युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को घुटने टेकने को मजबूर कर दिया। इसके बाद बांग्लादेश आजाद मुल्क बन गया। यह भारतीय सेना की बहादुरी, पराक्रम और शौर्य की याद दिलाने वाली तारीख है।

इसीलिए 16 दिसंबर का दिन विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। पाकिस्तानी सेना के 93,000 सैनिकों ने आज के ही दिन भारतीय सैनिकों के आगे घुटने टेकते हुए आत्मसमर्पण कर दिया था।

1947 तक भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश भौगोलिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक तौर पर एक राष्ट्र थे। 1947 में अंग्रेज़ो ने भारत से जाने का फैसला किया। जाने से पहले अंग्रेज़ भारत को दो हिस्सों में बांट कर चले गए। बंटवारे के बाद दो देश बने भारत और पाकिस्तान। पाकिस्तान का जन्म धर्म के आधार पर हुआ। लेकिन धर्म पाकिस्तान को लंबे अरसे तक बांध कर नहीं रख सका। तब मौजूदा पाकिस्तान पश्चिमी पाकिस्तान था और आज का बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान। आज़ादी के कुछ साल बाद ही पंजाबी प्रभुत्व और पश्चिमी पाकिस्तान के दबदबे के ख़िलाफ पूर्वी हिस्से में असंतोष पनपने लगा।

भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाया मुद्दा

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यही नहीं पूर्वी पाकिस्तान पर पाकिस्तान के दमनकारी कार्रवाई और मानवाधिकारों के उल्लंघन को भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ में जोर शोर से उठाया और हस्तक्षेप की मांग की। हालांकि कई देश इसके खिलाफ थे लेकिन भारत ने फिर भी बांग्लादेश की मदद की। भारत ने बांग्लादेश को न सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर मदद की बल्कि इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन जुटाने की भी कोशिश की। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अमेरिका समेत कई देशों का दौरा कर पाकिस्तानी सेना के बांग्लादेश में किए जा रहे जुल्म और नरसंहार के बारे में बाताया. हालांकि अमेरिका ने तब भारत की मांगों को मानने और पाकिस्तान को रोकने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं किया।

3 दिसंबर को पाकिस्तान ने युद्ध की शुरुआत की

शांति स्थापित करने के भारत के लगातार प्रयास के बावजूद जब पाकिस्तानी वायु सेना ने 3 दिसंबर को भारतीय वायु सेना के ठिकानों पर हमला बोल दिया। तब भारत को इस लड़ाई में सीधे तौर पर शामिल होना पड़ा। इसके साथ ही 1971 की भारत-पाक युद्ध की शुरुआत हो गई. पाकिस्तान, चीन, अमेरिका और इस्लामिक देश बांग्लादेश के गठन के खिलाफ थे। लेकिन भारत ने पूर्वी पाकिस्तान के नेताओं और लोगों को पूरा सहयोग दिया ताकि वो पाकिस्तान के पंजे से छुटकारा पा सके।
पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों ने किया सरेंडर
तेरह दिनों तक चले इस युद्ध में भारतीय सेना के बहादुरी और शौर्य के सामने पाकिस्तान ने घुटने टेक दिए। 16 दिसंबर 1971 को शाम 4.35 बजे पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी ने 93 हजार सैनिकों के साथ भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और भारत के लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का ये सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण था। इसके साथ ही दुनिया के मानचित्र पर एक नए देश बांग्लादेश का उदय हुआ।

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के नायक

मेजर जनरल जेएफ़आर जैकब

1971 के बांग्लादेश युद्ध में पूर्वी कमान के स्टाफ़ ऑफ़िसर मेजर जनरल जेएफ़आर जैकब ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वे जैकब ही थे जिन्हें सैम मानेकशॉ ने आत्मसमर्पण की व्यवस्था करने ढाका भेजा था। 1971 की युद्ध में आर्मी की पूर्वी कमान को लीड करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल जैकब सबसे पहले ढाका पहुंचे थे। युद्ध के दौरान जैकब मेजर जनरल के पद पर थे। उन्होंने ही पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट जनरल नियाज़ी से बात कर हथियार डालने के लिए राज़ी किया था।
भारत की स्थिति जीत से मजबूत हुई थी।

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सैम मानेकशॉ अहम नायक 

इस युद्ध के दौरान भारतीय सेना का नेतृत्व सैम मानेकशॉ कर रहे थे। उन्होंने इस जीत में अहम भूमिका निभाई थी। 1971 की इस जीत ने क्षेत्र में भारत की स्थिति को मजबूत किया था और भारतीय सेना के इतिहास में एक ऐसा नया चैप्टर जोड़ दिया था जिस पर भारत का हर निवासी गर्व करता है और जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।

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सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल

सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल ने 1971 में बसंतसर की जंग में अपने साहस और सैन्य कुशलता से दुश्मनों के हौंसलों को पस्त कर दिया था। उन्होंने अपने युद्ध कौशल और पराक्रम के दम पर दुश्मनों को एक इंच आगे बढ़ने नहीं दिया था और उन्हें भारी शिकस्त देते हुए पीछे ढकेल दिया था। वे सबसे कम उम्र में मरणोपरांत परमवीर चक्र पाने भारतीय जांबाजों में से एक हैं।

Arun Khetarpal

विजय दिवस के 51 साल पूरे

विजय दिवस भारत के सैनिकों के पराक्रम, साहस और शौर्य की गाथा है। पाकिस्तान पर अपनी इस जीत को भारत जहां विजय दिवस के रूप में मनाता है, वहीं बांग्लादेश इसको उच्चारण के थोड़े अंतर से ‘बिजॉय दिबोस’ के नाम से मनाता है। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम और इसमें भारत का योगदान मानवीय इतिहास में एक अनोखी घटना के रूप में दर्ज रहेगा। यह युद्ध भारत के लिए ऐतिहासिक युद्ध था जिसने भारत के सैन्य क्षमता को पूरी मजबूती के साथ वैश्विक स्तर पर स्थापित कर दिया। इस युद्ध के 51 साल पूरे हो गए हैं।

 

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