April 20, 2024

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समलैंगिक विवाह पर संत समाज में गहरा रोष, जैन संत लोकेश मुनि ने कहा ऐसे किसी भी अधिकार को कानूनन मान्यता देना गलत

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Same Sex Marriage

Same Sex Marriage : समलैंगिक शादी (Same Sex Marriage) को मान्यता देने को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में इन दिनों सुनवाई चल रही है. जिसको लेकर अगले कुछ दिनों में निर्णय आने वाला है. हालांकि इस बीच अदालत के फैसले से पहले ही समलैंगिक शादी को कानूनी मान्यता देने के कयाश को लेकर साधु-संतों समेत कई राष्ट्र सेवी समाजों द्वारा इसका विरोध किया जा रहा है.

समलैंगिक विवाह के विरोध में संतों की बैठक

Same Sex Marriage

इस क्रम में आज शुक्रवार (28 अप्रैल) को नई दिल्ली के रामलीला मैदान के पास स्थित श्रीराम हनुमान वाटिका में विश्व हिंदू परिषद के दिल्ली प्रांत द्वारा समलैंगिक विवाह (Same Sex Marriage) को मंजूरी देने के विरोध में संतों की बैठक बुलाई गई. जिसमें, दक्षिण और उत्तर भारत के साधु-संत इस मुद्दे पर एक साथ नजर आए.

बैठक में पूज्य रामानंद स्वामिंगल और पूज्य आत्मानंद स्वामिंगल समेत अन्य संतों ने समलैंकि विवाह को मंजूरी दिए जाने का विरोध करते हुए अपनी बातों को प्रमुखता से रखा.

समलैंगिक विवाह भारत की संस्कृति से मेल नहीं खाता

Same Sex Marriage

इस दाैरान जैन संत लोकेश मुनि जी ने कहा कि समलैंगिक विवाह (Same Sex Marriage) भारत की संस्कृति से मेल नहीं खाता अतः ऐसे किसी भी अधिकार को कानूनन मान्यता देना गलत है। उन्होंने कहा हम सभी भारत के संविधान और कानून का सम्मान करते हैं हम यह मानते हैं कि हमारा संविधान सबको अपने ढंग से जीने का अधिकार देता है किंतु निवेदन करना चाहते हैं कि समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता प्रदान करना निश्चित रूप से भारत की सभ्यता एवं संस्कृति के खिलाफ होगा, उसके साथ खिलवाड़ करने जैसा होगा।

उनके अनुसार भारत जैसे 135 करोड़ वाली जनसंख्या वाले देश में केवल कुछ लोगों के कहने से 134 करोड़ से भी ज्यादा लोगों की सभ्यता और संस्कृति को खतरे में डाल देना इस पर चिंतन करने की आवश्यकता है।

कपिल खन्ना ने दिया बड़ा बयान

Same Sex Marriage

विश्व हिंदू परिषद के प्रांत अध्यक्ष श्री कपिल खन्ना ने कहा कि हम भारत की न्याय व्यवस्था का सम्मान करते हैं। हमने सालों तक राम मंदिर के लिए कोर्ट के सम्मानजनक आदेश का इंतजार किया है आज भी हम भारत की न्याय व्यवस्था में पूरी श्रद्धा रखते हैं और इस व्यवस्था से अपने प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण की उपेक्षा करते हैं।

उन्होंने कहा उपस्थित संत समाज के साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था में भी लोग इस व्यवस्था को लेकर द्रवित और चिंतित है। यह आम धारणा है कि समलैंगिकता को मान्यता प्राप्त होने से भारत की संस्कृति और सभ्यता और भारत की मूलभूत धार्मिक भावनाओं को खतरे में डालने जैसा होगा। पूज्य बौद्ध संत भंते संघप्रिय राहुल का कहना है कि समाज विवाह को परिभाषित करता है और कानून उसे केवल मान्यता देता है।

विवाह कानून द्वारा रचित एक सामाजिक संस्था नहीं है बल्कि यह एक सदियों पुरानी संस्था है जिसे समाज ने समय के साथ परिभाषित और विकसित किया है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव के द्वारा चुनी गई सरकार लोगों की इच्छाओं को व्यक्त करती है विधानमंडल के माध्यम से व्यक्त की गई जन अभिव्यक्ति से विवाह जैसी संस्था में कोई भी संशोधन प्रभावी नहीं होना चाहिए।

क्या है पूरा मामला

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दरअसल भारत में आज भी समलैंगिक विवाह (Same Sex Marriage) या संबंध को घृणा की दृष्टि से देखा जाता है. इसके साथ ही भारतीय संस्कृति में इस तरह के अनैतिक विवाह की अनुमति नहीं है. हालांकि 2018 में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया गया. जिसके बाद अलग-अलग राज्यों में सेम सेक्स मैरिज को कानूनी मान्यता देने की मांग उठने लगी.

मांग के तहत देश के अलग-अलग कोर्टों में लगभग 20 याचिकाएं दायर की गई. जिसमें हैदराबाद के गे कपल सुप्रिया चक्रवर्ती और अभय डांग प्रमुख थे. बता दें कि ये गे कपल पिछले दस सालों से अपनी शादी को कानूनी मान्यता दिलाने के लिए संघर्ष कर रहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था फैसला

Same Sex Marriage

कपल ने समलैंगिक विवाह (Same Sex Marriage) को मान्यता देने को लेकर पिछले साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट की ओर रुख किया था. कपल का कहना है कि LGBTQIA+ नागरिकों को भी अपने पसंद के व्यक्ति के साथ शादी करने का अधिकार मिलना चाहिए.

जिसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है. याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी, अभिषेक मनु सिंघवी समेत 4 राज्य पेश कर रहे हैं.

कोर्ट ने बताया इसे ‘मौलिक मुद्दा’

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सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)ने कई राज्यों के अदालतों में समलैंगिक विवाह (Same Sex Marriage) से जुड़ी याचिकाओं को अपने पास ट्रांसफर करा लिया. मामले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की तीन सदस्यीय पीठ ने समलैंगिक विवाह को ‘मौलिक मुद्दा’ बताते हुए इसे पांच जजों की संविधान पीठ को भेजने की सिफारिश की. इसके बाद मुख्य न्यायाधीश डॉ डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई में पांच जजों की संविधान पीठ बनाई गई जो इस मामले की सुनवाई कर रही है.

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